दंगा ( सामाजिक उपन्यास)
लेखक-सुरेश चौधरी
प्रकाशक - नीलम जासूस कार्यालय
पृष्ठ संख्या- 184
लेखक के 'दंगा ' उपन्यास के पहले कुछ सामाजिक उपन्यास 'खाली आँचल-2005, 'अहसास'-2015 और 'प्रतिशोध'-2019 और 'केेसके'-2021 प्रकाशित चुके हैं। इनके उपन्यास मुख्यत: आम इंसान के जीवन मे आनेवाली समस्याओं और संघर्ष पर आधारित होते है ।
दंगा की कहानी शकुन की कहानी है जो उपन्यास की मुख्य नायिका है। शहर के मेडिकल कॉलेज से एम .बी. बी. एस . के प्रथम वर्ष में अध्ययनरत मेधावी छात्रा शकुन एक गरीब परिवार से है ।
उपन्यास की शुरुआत इसी मेडिकल कॉलेज से होती है और शकुन को पता चलता है कि शहर में दंगे भड़क गए है । किसी तरह शकुन घर पहुचती है तो एक बुरी खबर उसका इंतजार कर रही होती है। जब उसको पता चलता है कि उसके शिक्षक पिता को दंगाइयों ने मार दिया है। अपने परिवार को दंगाइयों से बचाने के संघर्ष कर रही शकुन अपने पिता के जाने के गम में डूबी रहती है और फिर अचानक
शकुन पर एक और वज्रपात होता है जब एक रात उसकी माँ भी एक "हादसे "का शिकार हो जाती है ।जिसका जिम्मेदार शकुन ख़ुद को समझती रहती है। शकुन को ऐसे समय समीर का ही सहारा मिलता है जो उससे बेहद प्यार करता है लेकिन अब परिवार की जिम्मेदारी शकुन उठाती है और समीर से शादी करने से मना कर देती है। लेकिन उसकी समस्याएं यही समाप्त नही होती उसके ऊपर क्षेत्र के विधायक शम्भूनाथ की भी बुरी नजर है जो उसको किसी तरह पाना चाहता है।
क्या शकुन अपने भाइयों अमन, नमन और बहन निशा की जिम्मेदारी उठा पाती है??
समीर और शकुन की प्रेम कहानी क्या मोड़ लेती है? क्या शकुन भी समीर से प्रेम करती है ?
शकुन के डॉक्टर बनने के सपने का क्या होता है?
विधायक शम्भूनाथ और शकुन के बीच संघर्ष में किसकी जीत होती है?
दंगे की पृष्ठभूमि पर लिखा गया उपन्यास शकुन के संघर्ष की गाथा है जिसमे एक तरफ अपने परिवार के लिये प्रेम और त्याग की भावना है तो दूसरी तरफ अपने व्यक्तिगत जीवन का संघर्ष भी है जिसको लेखक ने बखूबी दर्शाया है। समीर और शकुन की प्रेम कहानी को बहुत ही सुंदरता से लेखक ने दर्शाया है।उपन्यास की भाषा बहुत सरल है और संवाद बहुत ही प्रभावित करते है।अपनी स्वर्गवासी माँ के साथ शकुन का संवाद का दृश्य बहुत भावुक करता है।
उपन्यास में भाषागत अशुद्धिया बहुत है ।प्रूफरीडिंग की कमियो को छोड़ दिया जाए तो उपन्यास बहुत रोचक है और सामाजिक उपन्यास के प्रेमी इसको एक बार जरूर पढ़ सकते है।उपन्यास किंडल पर भी उपलब्ध है।
संजय आर्य
(इंदौर)

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