लल्लू
लेखक:स्वर्गीय वेद प्रकाश शर्मा सर
पृष्ठ संख्या:288
मूल्य:10 रुपये
"दिमाग का इस्तेमाल कर ताऊ, इसमें बड़ी ताकत होती है"
ये डायलॉग गुलशन ग्रोवर साहब अपने अनूठे अंदाज में "सबसे बड़ा खिलाड़ी" मूवी में बोलते नजर आते है।
ये मूवी वेद सर की शानदार उपन्यास "लल्लू "पर ही आधारित थी, जो 1995 में आई थी, और उस साल की ब्लॉकबस्टर मूवी की लिस्ट में शामिल हुई थी!
अब आते है कहानी पर, ये कहानी है प्रतिशोध की, उमड़ते भावनाओं, प्यार की, दोस्ती और बदले की,
कहानी शुरू होती एक निरा बेवकूफ इंसान से जिसे गंवार कहना बेहतर होगा,लेकिन उस में एक खूबी भी थी,उस में ईमानदारी गजब की थी, अपनी इसी खूबी की वजह से वह एक बहुत ही अमीर आदमी की घर में इंट्री कर लेता है,इंट्री क्या करता है,दामाद ही बन बैठता है,
मामला यहीं बिगड़ जाता है जब, जिस लड़की से उसकी शादी होती है वह लड़की किसी दूसरे लड़के से प्यार करती है,तब परिस्थितियों में फंस कर लड़की, उसका बॉयफ्रेंड और उसके बायफ्रेंड का बाप तीनों मिलकर उस सीधे साधे और बेवकूफ इंसान की हत्या कर देता है,
और यही इन तीनों की सबसे बड़ी भूल साबित होती है,
क्युकी अगले ही दिन मरा हुआ बेवकूफ गवार आदमी पुलिस इंस्पेक्टर के रूप में आता है और उन तीनों को अपनी हत्या की जुर्म में गिरफ्तार कर लेता है,
इसी दौरान बॉयफ्रेंड के बाप को पता चलता है,जिसकी हत्या उसके बेटे ने की उसकी हत्या तो उसने आज से 21 साल पहले उसने खुद की थी,
यही कहानी का चरमोत्कर्ष है लड़के का बाप खुद को हत्यारा साबित करने के लिए मरा जा रहा था, लेकिन साबित कैसे करता ,
यही से पाठको का दिमाग घूमने लगता है हजारों प्रश्न जेहन में घूमने लगते है,मसलन
क्या वह बेवकूफ और ग्वार आदमी सच में बेवकूफ और ग्वार था ??
उसकी हत्या परिस्थितियो में फंस कर तीनों ने की थी या उसने परिस्थितियों को ही ऐसा बना दिया था ???
सबसे बड़ा सवाल बेवकूफ आदमी ही इंस्पेक्टर था या कोई दूसरा आदमी था ???
21 साल पहले की हत्या का क्या रहस्य था ??
और ये वर्तमान की घटना से किस तरह जुड़ी थी ??
21 साल पहले जब लड़के के बाप ने हत्या कर दी थी उसी आदमी की हत्या लड़के ने 21 साल बाद कैसे कर दी ??
उपन्यास की खासियत यह है कि हमेशा की तरह कितना भी सोच लीजिए, अंत तो आपके सोच के उल्टा ही होता है ।
अगर आप ने "सबसे बड़ी खिलाड़ी" मूवी देख रखी हो तब भी आपको एक बार ये उपन्यास जरूर पढ़नी ही चाहिए, क्युकी उपन्यास का 20 परसेंट कहानी को ही मूवी में डाली गई है और क्लाइमेक्स तो एक दम अलग ही है ।
अगर पाठको को कहानी का असली मजा लेना हो तो एक बार तो पढ़नी ही चाहिए।
पड़ने के बाद मुंह से बस दो ही शब्द निकलते है
"अदभुत" , "अतुलनीय"
समीक्षा : आशीष रंजन

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