मैं अपराधी जन्म का ( सुरेंद्र मोहन पाठक)

मैं अपराधी जन्म का ( सुरेंद्र मोहन पाठक) 



 वक्त एक सा नहीं रहता हमेशा बदलता रहता है । सोने की चमक फीकी पड़ जाती है। यही साबित करती है  "मैं अपराधी जन्म का" सुरेंद्र मोहन पाठक  की नयी रचना है। जिसमें "विमल के संसार " को बढ़ाने की कोशिश की गई है। जिस तरह से विमल की कहानी को आगे बढ़ाया गया है लगता है जबरदस्ती रबर को खींचा जा रहा है । विमल को संसार विरक्त कर फिर वापस मुख्य धारा में जोड़ने की कोशिश जम नही रहा। कहानी में वो धार नजर नहीं आता जो विमल सीरिज में होती है। पिछले कुछ रचनाओं से ही पैनापन कम होता गया । उपन्यास एकदम थका हुआ महसूस किया मैने न कोई रोमांच न ही आगे क्या होगा जैसी उत्सुकता । 
      लगता ही नहीं   300 नॉवेल लिखने वाले लेखक की लेखनी है। लगा जैसे नौसिखिए लेखक ने लिखा है नाम सिर्फ सुमोपा का ।  घटनाक्रम को खींच कर पूरे उपन्यास में खींचा गया कहानी तेजी से बढ़ी ही नहीं ।पहले की उपन्यासों को एक ही बैठक में पढ़ता था इसे तो पढ़ते समय ऊब आने लगती थी किसी तरह  4 दिन में खत्म किया। 
          अब नए लेखक भी अच्छे लिखने लगे है। जो पाठको बांधे रहते है। मुझे उपन्यास पूरी तरह निराश किया । मेरी तरफ इस रचना को 
           **(🌟🌟)

समीक्षक : शेखर भारती

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