फिंगरप्रिंट:- उपन्यास
लेखक:- सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब
पृष्ठ:-318
प्रकृति की एक नियम है जो बोए हो वह काटना पड़ेगा,कभी कभी अतीत में किए गए पाप जब वर्तमान में आकर अपना हिसाब मांगने लगता है तो इंसान को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है,इंसान ब्याकुल हो उठता है,
पर क्या हो जब पाप आपका नहीं होकर आपके किसी खास का हो और उसका हिसाब आपको देना हो
ऐसी ही कुछ परस्थिति अपने उपन्यास के नायक के सामने खड़ी हो जाती है, जब एक आदमी उसकी नई नवेली पत्नी की 2 साल पहले की पाप का सच लेकर उसके सामने उपस्थित होता है, और 12 लाख की डिमांड कर देता,और खुद को इकबाल भाई का आदमी बताता है, अब लाजमी है अपने कहानी का नायक ये बात जानकर व्याकुल हो उठता है और रिपोर्टर सुनील के पास जाता है खुद को और अपनी पत्नी को इस जंजाल से बचाने के लिए
अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि
वह पाप क्या था, जो उसकी वाइफ ने 2 साल पहले की थी
इकबाल भाई कौन था
कहानी के नायक की पत्नी का पाप आगे क्या गुल खिलाता है
क्या सुनील नायक को इन झमेलों से बचा पाया
कहानी शुरू में तो पाठको को बांध कर रखती है, पर जैसे जैसे आगे बढ़ती है स्लो होने लगती है, लास्ट भी उतनी खास नहीं है,
कहानी का अंत वही है जो 99 परसेंट ब्लैकमेलर टाइप नॉवेल की होती है,
कुल मिलाकर यह एक साधारण मर्डर मिस्ट्री नॉवेल है, जो एक बार पड़ने योग्य है
क्यों पढ़े:- अगर आप पाठक साहब के डाई हार्ड फैन है तो पढ़ सकते है
क्यों नहीं पढ़े:- अगर आप एक अच्छी कहानी की तलाश में है, ये नॉवेल आप के लिए नहीं है, इस से अच्छी सैकड़ों नॉवेल मार्केट में उपलब्ध है
रेटिंग:-4/10
समीक्षक (आशीष रंजन -Ujjain)

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