उपन्यास:- क़त्ल के दावेदार
लेखक:- राहुल
प्रकाशक:- डायमंड पॉकेट बुक्स
समीक्षक :- अमितेश प्रताप सिंह
कहानी शुरू होती शहर के जाने माने रईस सेठ दीनानाथ से जो अपने वकील दोस्त को अपनी वसीयत कुछ इस तरह बनाने बोलता है कि जो कोई उसका क़त्ल करेगा वो उसकी सारी संपत्ति का हकदार बन जायेगा, सेठ का वकील दोस्त तो पहले आश्चर्य व्यक्त करता है लेकिन सेठ की जिद के आगे उक्त वसीयत बना देता है।
इस घोषणा से ही सेठ को मारने की इच्छा रखने वालों की संख्या में इजाफा हो जाता है अधिकतर तो उस अजीबोगरीब वसीयत के कारण ही सेठ को मारने का इरादा रखते है लेकिन इन सब के बीच एक ऐसा शख्स होता है जो सेठ दीनानाथ से निहायत ही नफरत करता है और सेठ की जान उसके अलावा कोई और ले उसे नागवार है।
अनेक अजीबोगरीब हादसों के बीच सेठ को मारने की कोशिश की जाती है लेकिन हर बार चमत्कारिक ढंग से सेठ बच जाता है और हर बार अपने दुश्मन को चौका देता है।
आगे चल कर आखिरकार सेठ की हत्या हो ही जाती है और हर कोई क़त्ल का दावा करता है, वो शख्स जो खुद सेठ से नफरत करता है उसे अफसोस रहता है कि वो सेठ का कत्ल न कर सका।
इन प्रश्नों के लिए उपन्यास को पढा जा सकता है
सेठ की अजीबोगरीब वसीयत का क्या कारण है?
क्या वजह है कि सेठ हर बार बच जाता है?
सेठ का असली कातिल कौन है?
उसने सेठ को क्यों मारा? हालांकि लगता है इसका जवाब लेखक महोदय के पास भी नही है।
उपन्यास की कमियाँ
कहानी को जबरदस्ती खींचा गया है।
हत्यारे का मकसद नही बताया गया।
लेखक 70 के दशक की फिल्मों से प्रभावित जान पड़ता है।

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